जीवन परिचय

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जीवनी – Netaji Subhash Chandra Bose wiki Biography in hindi

अंग्रेज सामराज्यवाद के विरुद्ध सशक्त रूप से बगावत बुलंद करने वाले तथा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा के नारे की गर्जना करने वाले सुभाष चंद्र बोस का जन्म 3 फरवरी 1997 को उड़ीसा में हुआ था. 

शिक्षा दीक्षा

उनके पिता रायबहादुर जानकी दास वकील थे नेताजी की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा उड़ीसा के कटक में हुई थी इसके बाद वह बीए की परीक्षा पास करके आई सी की परीक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए वहां से लौट कर एक सरकारी नौकरी में अधिकारी पद पर नियुक्त हुए बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर देश सेवा का व्रत लिया और बंगाल के प्रसिद्ध देशभक्त चितरंजन दास के बताए देश सेवा के मार्ग पर चल पड़े जय कांग्रेस पार्टी में सम्मिलित हुए उन दिनों कांग्रेस ने गरम और नरम दोनों प्रकार के दिल हुआ करते थे यदपि नेताजी गरम दल के नेता थे फिर भी वह गांधी जी का सम्मान करते थे पर उन्होंने बाद में गांधी जी से विचारों में मतभेद के कारण कांग्रेस पार्टी छोड़ दी

1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।

रानी झांसी रेजिमेंट

महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।

1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस ‘विद्रोही अध्यक्ष’ ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।

इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का। नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।

सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं।

नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।

‘नेताजी’ के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ की स्थापना की तथा ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” दिया।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के महत्वपूर्ण कार्य

सन 1942 में वह जापान गए वहां उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए आजाद हिंद फौज का गठन किया साधनों की कमी होने के बावजूद भी उन्होंने बेटी सपोर्ट से हटकर लोहा लिया  परंतु विजयश्री ना पा सके

निधन

23 अगस्त 1945 को तो Tokyo (Radio) रेडियो ने एक समाचार प्रसारित किया कि सुभाष चंद एक विमान दुर्घटना में मारे गए परंतु लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ परिणाम बिन की मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है आज भी जय हिंद का नारा तथा कदम कदम बढ़ाए जा गीत सभी भारतवासियों के कानों में गूंज रहे हैं

नेताजी सुभाष चंद्र आज भी हमारे देश के नौजवानों के प्रेरणा स्रोत हैं उनकी आजादी हिंद फौज के सैनिकों को देश की आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव भारत में सरकार ने दिया

सुभाष चन्द्र बोस के अनमोल विचार

”तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”

”जो फूलों को देखकर मचलते हैं उन्‍हें कांटे भी जल्‍दी लगते हैं।”

”अपनी ताकत पर भरोसा करो, उधार की ताकत तुम्‍हारे लिए घातक है।”

”याद रखिए सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना है”

”इतिहास में कभी भी विचार-विमर्श से कोई वास”

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